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नाबालिग की सहमति कानूनी रूप से मान्य नहीं: दुष्कर्म मामले में हाईकोर्ट ने 7 साल की सजा बरकरार रखी

नाबालिग की सहमति कानूनी रूप से मान्य नहीं: दुष्कर्म मामले में हाईकोर्ट ने 7 साल की सजा बरकरार रखी

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नाबालिग छात्रा से दुष्कर्म के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि पीड़िता नाबालिग है, तो उसकी कथित सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं होता। अदालत ने बस्तर के सत्र न्यायालय द्वारा आरोपी को सुनाई गई 7 वर्ष के सश्रम कारावास और 500 रुपये जुर्माने की सजा को बरकरार रखा है।

आरोपी की दोनों अपीलें खारिज, जेल भेजने का आदेश

हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती देने वाली आरोपी की दोनों अपीलों को खारिज करते हुए उसका बेल बॉन्ड निरस्त कर दिया और उसे हिरासत में लेकर जेल भेजने का निर्देश दिया।

टीवी देखने के बहाने घर आता था आरोपी

मामले के अनुसार, बस्तर जिले की एक मिडिल स्कूल छात्रा के माता-पिता आजीविका के लिए दूसरे गांव गए हुए थे। इसी दौरान आरोपी टीवी देखने के बहाने घर आता था और नाबालिग का कथित रूप से यौन शोषण करता था।

बाद में होली के दौरान जब परिजन लौटे तो किशोरी की तबीयत खराब रहने लगी। अस्पताल में जांच के दौरान डॉक्टरों ने उसके पांच माह की गर्भवती होने की पुष्टि की। इसके बाद पीड़िता ने अपने साथ हुई घटना की जानकारी परिवार को दी।

पंचायत में स्वीकार किया आरोप, फिर मुकर गया परिवार

12 मार्च 2009 को गांव में पंचायत बुलाई गई, जहां आरोप है कि आरोपी और उसके परिजनों ने गलती स्वीकार करते हुए पीड़िता को अपने घर रखने और पुलिस में शिकायत नहीं करने का आश्वासन दिया। हालांकि कुछ दिनों बाद लड़की को घर से निकाल दिया गया। इसके बाद पीड़िता के पिता ने 28 मार्च 2009 को थाने में एफआईआर दर्ज कराई।

बचाव पक्ष ने सहमति और एफआईआर में देरी का दिया तर्क

आरोपी की ओर से अदालत में दलील दी गई कि एफआईआर घटना के काफी समय बाद दर्ज हुई और पीड़िता की उम्र 16 वर्ष से कम होने के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि दोनों के बीच संबंध आपसी सहमति से बने थे।

हाईकोर्ट ने साक्ष्यों के आधार पर खारिज की दलीलें

अदालत ने स्कूल के दाखिला रजिस्टर, जन्मतिथि प्रमाणपत्र और मेडिकल रिपोर्ट का परीक्षण करते हुए पाया कि घटना के समय पीड़िता कानूनन नाबालिग थी। रिकॉर्ड के अनुसार उसकी जन्मतिथि 16 जनवरी 1996 दर्ज थी, जबकि चिकित्सीय परीक्षण में भी उसकी उम्र लगभग 13 से 15 वर्ष के बीच पाई गई।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि नाबालिग की सहमति कानून की नजर में मान्य नहीं होती, इसलिए इस आधार पर आरोपी को राहत नहीं दी जा सकती। इसी के साथ अदालत ने दोषसिद्धि और सजा को यथावत रखते हुए आरोपी की अपीलें खारिज कर दीं।

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Editor Jamhoora

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