सुख, समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक
रायपुर। नवरात्रि का पावन पर्व मां दुर्गा की आराधना और भक्ति का उत्सव है। इस दौरान कई विशेष परंपराएं निभाई जाती हैं। इन्हीं में से एक है कलश स्थापना के साथ जौ (जवारे) बोना। यह परंपरा सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं बल्कि इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व छिपा है।
क्यों बोए जाते हैं जवारे?
मान्यता है कि जौ सृष्टि की पहली फसल है, इसलिए किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत में इसका विशेष स्थान होता है। नवरात्रि में जौ बोना नई शुरुआत और उन्नति का प्रतीक माना जाता है। यह अनाज देवी अन्नपूर्णा का स्वरूप है, जो घर-परिवार में धन-धान्य और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।
भविष्य का संकेत
नवरात्रि के नौ दिनों में जवारे का उगना शुभ-अशुभ का संकेत भी माना जाता है। अगर जवारे तेजी से, लंबे और हरे-भरे निकलते हैं तो इसे परिवार के लिए सुख, समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। यह परंपरा हमें प्रकृति से जोड़ती है और यह भी सिखाती है कि जैसे बीज बोकर फसल मिलती है, वैसे ही हमारे कर्मों के भी फल मिलते हैं।
नवरात्रि में जवारे बोने का सही तरीका
- मिट्टी के पात्र को अच्छी तरह शुद्ध कर लें।
- पात्र के नीचे हल्दी या रोली से स्वस्तिक या ऊँ का चिन्ह बनाएं।
- पात्र में शुद्ध, उपजाऊ और कंकड़-मुक्त मिट्टी बिछाएं।
- जौ के दानों को एक दिन पहले पानी में भिगो दें।
- भीगे हुए जौ को पात्र में छितरा कर उस पर पतली मिट्टी की परत डालें।
- पात्र को मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर के सामने रखें।
- रोज सुबह-शाम हल्का जल छिड़काव करें और मिट्टी को नम बनाए रखें।
- नौ दिनों में जवारे हरे-भरे होकर शुभ संकेत देते हैं।
