Supreme Court on SIR Hearing:
12 राज्यों में जारी विशेष मतदाता पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने 27 नवंबर को अहम टिप्पणी की। शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि चुनाव आयोग के संवैधानिक अधिकारों पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता। कोर्ट ने SIR प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार करते हुए कहा कि अगर किसी चरण पर अनियमितता पाई गई तो सुधार के निर्देश दिए जाएंगे। अब इस मामले की अगली सुनवाई 2 दिसंबर को तय की गई है।
सर्वोच्च न्यायालय में CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने राजद सांसद मनोज झा की याचिका पर सुनवाई की। बेंच ने कहा कि SIR की आवश्यकता और तर्कसंगति को चुनौती देने वाले बिंदुओं में दम नज़र नहीं आता।
सुनवाई में सिब्बल का सवाल— “पिता का जन्म प्रमाण कैसे दूं?”
बहस के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने SIR में मांगे जा रहे दस्तावेजों को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने तर्क दिया कि यह प्रक्रिया विदेशी नागरिक अधिनियम जैसी प्रतीत हो रही है, जहां नागरिकता साबित करने का बोझ व्यक्ति पर ही डाल दिया जाता है।
सिब्बल ने कोर्ट से पूछा—
“अगर किसी वोटर के पिता का जन्म प्रमाण पत्र ही उपलब्ध नहीं है, तो वह यह कैसे साबित करे कि उसके माता-पिता भारतीय थे? और यदि पिता की मौत 2003 से पहले हो गई हो और उन्होंने उस चुनाव में वोट भी न दिया हो, तो नागरिकता की पुष्टि कैसे होगी?”
इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा—
“यदि पिता का नाम मतदाता सूची में नहीं है और आपने भी समय रहते इसे नहीं देखा… तो संभव है कि गलती आपकी तरफ से हुई हो।”
BLO की शक्तियों पर भी उठे सवाल
सिब्बल ने बूथ स्तर अधिकारियों (BLO) की कार्यप्रणाली पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने पूछा कि क्या BLO यह तय कर सकता है कि कोई व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ है या उसकी भारतीय नागरिकता संदिग्ध है? उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी जिम्मेदारी बिना स्पष्ट सीमाओं के देना कई समस्याएं पैदा कर सकता है।
कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अगली तारीख 2 दिसंबर निर्धारित कर दी।
