नई दिल्ली/वॉशिंगटन। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में बड़ा बदलाव लाने वाली एक अहम खबर सामने आई है। रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मिलकर एक नए सुपर-पावर फोरम ‘C-5 फोरम’ की रूपरेखा पर काम कर रहे हैं। यह समूह वैश्विक राजनीति में G7 जैसा प्रभावशाली माना जा रहा है, हालांकि इसका आधार ‘लोकतंत्र’ नहीं बल्कि जनसंख्या और भू-राजनीतिक ताकत होगी।
इस संभावित C-5 फोरम में अमेरिका, रूस, चीन, भारत और जापान—ये पांच बड़ी शक्तियां शामिल होंगी। यह प्लेटफॉर्म दुनिया में तेजी से बदल रहे शक्ति-संतुलन के बीच “मल्टीपोलर वर्ल्ड” के सिद्धांत पर आधारित माना जा रहा है।
क्या है C-5 फोरम का उद्देश्य?
डिफेंस वन और पोलिटिको की रिपोर्ट्स के अनुसार, व्हाइट हाउस की नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रैटेजी (NSS) के लंबी, अनपब्लिश्ड वर्ज़न में इस फोरम का उल्लेख है।
ट्रंप प्रशासन का मानना है कि—
- दुनिया अब मल्टीपोलर हो चुकी है
- G7 और पुराने वैश्विक ढांचे नई वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करते
- बड़ी जनसंख्या और प्रभाव वाले देशों के बीच सीधी वार्ता और डील-मेकिंग आसान होनी चाहिए
इस फोरम का पहला एजेंडा माना जा रहा है—
इज़राइल और सऊदी अरब के बीच ऐतिहासिक समझौता करवाना।
व्हाइट हाउस की सफाई– “कोई सीक्रेट प्लान नहीं”
व्हाइट हाउस प्रेस सेकरेटरी हन्ना केली ने इन रिपोर्टों को “ग़लत” बताते हुए कहा कि NSS का केवल 33 पेज का आधिकारिक वर्ज़न मान्य है, कोई गुप्त दस्तावेज मौजूद नहीं है।
इसके बावजूद ट्रंप प्रशासन के एक पूर्व अधिकारी ने बताया कि—
C5 या C7 जैसे नए कॉन्फ़िगरेशन पर चर्चा जरूर हुई थी, क्योंकि मौजूदा ढांचे (G7, UNSC) से नए जियोपॉलिटिकल समीकरण फिट नहीं बैठते।
यूरोप और NATO में बढ़ी चिंता
C-5 फोरम के संभावित गठन ने यूरोप और NATO देशों में बेचैनी बढ़ा दी है।
कारण यह है कि—
- इसमें रूस और चीन जैसे बड़े प्रतिद्वंद्वी देशों को बराबरी का दर्जा मिलेगा
- पश्चिमी देशों को डर है कि इससे यूरोपीय एकता कमजोर हो सकती है
- ‘स्फीयर्स ऑफ़ इन्फ्लुएंस’ का पुराना सिद्धांत फिर उभर सकता है, जहां हर बड़ी शक्ति अपना-अपना क्षेत्र नियंत्रित करे
यूरोपीय अधिकारियों का कहना है कि यह कदम NATO की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था को सीधे चुनौती दे सकता है।
क्या C-5 BRICS की तरह होगा?
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पहले से—
- BRICS,
- G20,
- SCO
जैसे बड़े फोरम मौजूद हैं।
लेकिन C-5 की विशेषता यह होगी कि यह सिर्फ सबसे अधिक जनसंख्या और सर्वाधिक सैन्य-आर्थिक शक्ति वाले देशों का ग्रुप होगा।
इसलिए इसे “स्ट्रॉन्गमेन क्लब” जैसा बताया जा रहा है।
भारत के लिए मौका भी, चुनौती भी
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत—
- मध्य-पूर्व
- इंडो-पैसिफिक
- एशियन सुरक्षा ढांचे
पर अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए इस फोरम का उपयोग कर सकता है।
लेकिन चुनौती यह है कि—
भारत को अमेरिका, चीन और रूस—तीनों के साथ एक ही टेबल पर संतुलन बनाना होगा।
ट्रंप की विदेश नीति में बड़ा बदलाव?
इस संभावित फोरम से यह संकेत मिलता है कि ट्रंप—
- रूस और चीन जैसे प्रतिद्वंद्वियों को बातचीत की मुख्यधारा में लाना चाहते हैं
- पुराने गठबंधनों (जैसे NATO, G7) को ‘पुराना मॉडल’ मानते हैं
- दुनिया को बड़े शक्ति-क्षेत्रों में संगठित करना चाहते हैं
यह वैश्विक राजनीति के नक्शे को बदल देने वाली पहल हो सकती है।
निष्कर्ष
अभी तक C-5 फोरम को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
लेकिन अमेरिकी मीडिया में चल रही चर्चाओं ने—
- यूरोप
- NATO
- और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति
को नई बहस की ओर धकेल दिया है।
क्या वाकई ट्रंप और मोदी मिलकर दुनिया का नया शक्ति केंद्र बनाने की ओर बढ़ रहे हैं?
आने वाले महीने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बड़े बदलाव ला सकते हैं।
