नई दिल्ली।
देश में बढ़ते डॉग बाइट मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अहम और दूरगामी असर वाला फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी आवारा कुत्ते के काटने से कोई बच्चा, बुजुर्ग या आम नागरिक घायल होता है या उसकी मौत होती है, तो संबंधित राज्य सरकार मुआवजा देने की जिम्मेदार होगी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने आवारा कुत्तों को सार्वजनिक स्थानों पर खाना खिलाने वालों पर भी कड़ी टिप्पणी की और कहा कि सिर्फ संवेदना नहीं, जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
🐕 ‘खाना खिलाते हैं तो घर भी ले जाएं’ – सुप्रीम कोर्ट
मामले की सुनवाई कर रही बेंच के जस्टिस विक्रम नाथ ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा,
“अगर आप कुत्तों को खाना खिला रहे हैं, तो उन्हें अपने घर लेकर जाएं। सड़कों पर छोड़ने से डर और खतरा दोनों पैदा हो रहे हैं।”
अदालत ने कहा कि भावनात्मक आधार पर सार्वजनिक सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता, खासकर जब मासूम बच्चों और बुजुर्गों की जान खतरे में हो।
⚖️ ‘संवेदना सिर्फ कुत्तों के लिए?’
वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी द्वारा दिए गए तर्कों पर कोर्ट ने कहा,
“भावुकता अक्सर सिर्फ जानवरों के लिए दिखती है, पीड़ित इंसानों के लिए नहीं।”
हालांकि, अधिवक्ता ने जवाब में कहा कि मानव और पशु—दोनों की सुरक्षा समान रूप से जरूरी है।
🗣️ डॉग बाइट पीड़िता ने रखा अलग नजरिया
डॉग बाइट की शिकार रही कामना पांडे ने अदालत में कहा कि
“कई बार कुत्तों की आक्रामकता के पीछे इंसानों की क्रूरता होती है। डर के कारण कुत्ते हमला करते हैं।”
उन्होंने बताया कि एक कुत्ते द्वारा काटे जाने के बाद उन्होंने उसी कुत्ते को गोद लिया, और बाद में उसने किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया। उन्होंने सुझाव दिया कि केवल नसबंदी नहीं, व्यवहार सुधार और सुरक्षित आश्रय भी जरूरी हैं।
🌱 इकोसिस्टम और सार्वजनिक सुरक्षा पर बहस
एनिमल वेलफेयर ट्रस्ट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कहा कि
“कुत्ते केवल खतरा नहीं, बल्कि इकोसिस्टम का हिस्सा भी हैं। वे चूहों जैसे रोग फैलाने वाले जीवों को नियंत्रित करते हैं।”
वहीं वरिष्ठ वकील पिंकी आनंद ने कहा कि
“जानवरों के प्रति दया जरूरी है, लेकिन इसके साथ जवाबदेही तय होना भी उतना ही जरूरी है। अभी देश में एबीसी (Animal Birth Control) केंद्रों की संख्या बेहद कम है।”
🏫 पहले ही दिए जा चुके हैं सख्त निर्देश
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 7 नवंबर 2025 को देशभर के स्कूलों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और खेल परिसरों से आवारा कुत्तों को हटाने के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने साफ कहा था कि सरकारी और सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों की मौजूदगी सुरक्षा के लिए खतरा है।
🔎 निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला साफ संकेत देता है कि अब डॉग बाइट को सिर्फ स्थानीय निकायों की समस्या नहीं माना जाएगा, बल्कि राज्य सरकारों की जवाबदेही तय होगी। साथ ही, सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों को खाना खिलाने वालों की भूमिका पर भी अब सवाल उठने लगे हैं।
