रायपुर। रायपुर में अब तक मुफ्त मिलने वाली फायर एनओसी (अनापत्ति प्रमाण पत्र) प्रक्रिया को निजी कंपनियों को सौंप दिए जाने के बाद विवाद खड़ा हो गया है। नई व्यवस्था के तहत फायर ऑडिट के नाम पर संस्थानों से भारी शुल्क वसूला जा रहा है, जिससे स्कूलों, कॉलेजों और अस्पतालों की चिंता बढ़ गई है।
10 रुपये प्रति वर्गफीट तक वसूली
नई प्रणाली में निजी एजेंसियां फायर ऑडिट के लिए 10 रुपये प्रति वर्गफीट तक चार्ज कर रही हैं। इसका मतलब यह है कि यदि किसी भवन का क्षेत्रफल 50 हजार वर्गफीट है, तो उसे सालाना करीब 5 लाख रुपये तक सिर्फ ऑडिट पर खर्च करने पड़ सकते हैं। छोटे संस्थानों के लिए भी यह खर्च हजारों से लाखों तक पहुंच रहा है।
छोटे अस्पतालों पर बढ़ा संकट
अंबिकापुर के निजी अस्पताल संचालकों ने इस व्यवस्था पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि इतनी भारी फीस देना छोटे अस्पतालों के लिए संभव नहीं है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं पर असर पड़ सकता है।
पहले थी मुफ्त और पारदर्शी प्रक्रिया
पहले फायर एनओसी की प्रक्रिया पूरी तरह निःशुल्क और पारदर्शी थी। ऑनलाइन आवेदन के बाद अग्निशमन विभाग की टीम निरीक्षण करती थी और मुख्यालय से प्रमाण पत्र जारी होता था। अब वही काम निजी कंपनियों से कराया जा रहा है, जिससे “ऑडिट” के नाम पर मोटी रकम वसूली जा रही है।
संस्थानों पर पड़ेगा सीधा असर
सरगुजा संभाग में ही
- मेडिकल कॉलेज, जिला अस्पताल
- 18 निजी अस्पताल
- 24 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र
- 193 उप स्वास्थ्य केंद्र
- 2365 स्कूल और 15 कॉलेज
इन सभी पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ने की आशंका है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका असर शिक्षा और इलाज की लागत बढ़ने के रूप में आम लोगों तक पहुंचेगा।
निजी कंपनियों की मनमानी के आरोप
राजधानी में एक अस्पताल को फायर ऑडिट के लिए करीब 70,800 रुपये का बिल दिया गया, जिसमें जीएसटी भी शामिल है। कई संस्थानों ने इतनी अधिक फीस देने से इनकार कर दिया है।
सरकार को भी मिलेगा हिस्सा
गृह विभाग के प्रमुख सचिव मनोज कुमार पिंगुआ ने कहा कि पहले एनओसी मुफ्त थी, जिससे सरकार को कोई राजस्व नहीं मिलता था। अब निजी कंपनियों के जरिए सरकार को भी फीस का कुछ हिस्सा मिलेगा। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि अधिक शुल्क को लेकर शिकायतें मिल रही हैं और मनमानी होने पर कार्रवाई की जाएगी।
बड़ा सवाल अब भी कायम
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब अग्निशमन विभाग के पास खुद प्रशिक्षित स्टाफ और संसाधन मौजूद हैं, तो यह जिम्मेदारी निजी कंपनियों को क्यों सौंपी गई। साथ ही, ऑडिट के बाद किसी हादसे की स्थिति में जिम्मेदारी किसकी होगी—यह भी अभी स्पष्ट नहीं है।
