Tribal Department में करोड़ों का घोटाला, अधिकारियों ने नियम तोड़कर ठेकेदारों को दिया फायदा, कलेक्टर की जांच में खुलासा
दंतेवाड़ा। आदिवासी विकास विभाग में हुआ फर्जी टेंडर घोटाला आखिरकार बड़े अफसरों तक पहुंच गया है। दंतेवाड़ा जिले में 2021 से लेकर अब तक विभाग द्वारा 45 टेंडर गुपचुप तरीके से फर्जीवाड़े के जरिए निकाले गए, जिनमें करोड़ों का भ्रष्टाचार सामने आया है। इस घोटाले की जांच में दोषी पाए गए तत्कालीन सहायक आयुक्त और वर्तमान में डिप्टी कमिश्नर डॉ. आनंदजी सिंह और रिटायर्ड सहायक आयुक्त केएस मसराम को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। वहीं विभाग का बाबू अब भी फरार है।
कैसे हुआ खुलासा?
दंतेवाड़ा कलेक्टर कुणाल दुदावत ने जब विभाग की चार सालों की फाइलें खंगालीं, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। पाया गया कि विभागीय अफसरों ने नियम-कायदों को ताक पर रखकर ठेकेदारों से सांठगांठ की और गुपचुप तरीके से 45 फर्जी टेंडर जारी कर दिए। यह पूरा खेल विभागीय नोटिस, संवाद और पारदर्शिता की प्रक्रिया को दरकिनार करके किया गया था।
अफसरों का घोटाला और ठेकेदारों की मिलीभगत
जांच में सामने आया कि अधिकारी मोटी कमीशन और चहेते ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के लिए टेंडरों की एडिटिंग और हेराफेरी करते थे। जिन कामों पर पहले से टेंडर निकले हुए थे, उन पर भी नए फर्जी टेंडर निकालकर ठेके दिए गए। सूत्र बताते हैं कि कुछ ठेकेदारों ने अधिकारियों से मिलीभगत कर इस भ्रष्टाचार को और बढ़ावा दिया।
एफआईआर और गिरफ्तारी
मामले में वर्तमान सहायक आयुक्त राजू कुमार नाग ने दंतेवाड़ा सिटी कोतवाली थाने में लिखित शिकायत दी। जिसके आधार पर पुलिस ने बीएनएस और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की गंभीर धाराओं 318(4), 338, 336(3), 340(2) और 61(2) के तहत एफआईआर दर्ज की। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए डिप्टी कमिश्नर आनंदजी सिंह को जगदलपुर से और रिटायर्ड सहायक आयुक्त केएस मसराम को रायपुर से गिरफ्तार कर लिया। वहीं विभाग का बाबू अब भी फरार है और उसकी तलाश जारी है।
आगे क्या?
फिलहाल पुलिस आरोपी अफसरों से पूछताछ कर रही है और अन्य टेंडरों की भी जांच शुरू कर दी है। कलेक्टर ने संकेत दिए हैं कि अभी और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं, क्योंकि कई निर्माण कार्यों में गड़बड़ी की आशंका है।
