बस्तर।
नक्सलियों के बढ़ते आत्मसमर्पण के बीच बस्तर को जल्द “सुरक्षित क्षेत्र” मान लेने की प्रशासनिक सोच एक ठेकेदार की जान पर भारी पड़ गई। बीजापुर जिले में सड़क निर्माण कार्य में लगे ठेकेदार इम्तियाज अली की नक्सलियों द्वारा अपहरण के बाद हत्या कर दी गई। इस घटना ने एक बार फिर नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक फैसलों की गंभीर खामियों को उजागर कर दिया है।
यह वारदात बीजापुर जिले के पामेड़ थाना क्षेत्र की बताई जा रही है। घटना के समय इम्तियाज़ अली अपनी टीम के साथ सड़क निर्माण कार्य में जुटे थे, तभी नक्सली वहां पहुंचे और उन्हें जबरन अपने साथ ले गए। बाद में मारपीट के बाद उनकी हत्या कर दी गई।

सुरक्षा के बिना काम का दबाव बना रहा विभाग
सूत्रों के अनुसार, संबंधित विभागों द्वारा यह मान लिया गया था कि क्षेत्र अब पूरी तरह सुरक्षित हो चुका है। इसी सोच के तहत ठेकेदारों पर बिना बल सुरक्षा के काम शुरू करने का दबाव बनाया जा रहा था। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) विभाग से जारी पत्र क्रमांक 1082/2025 (दिनांक 10 नवंबर 2025) इस बात की पुष्टि करता है।
पत्र में ठेकेदारों को निर्देश दिया गया था कि वे किसी भी स्थिति में तीन दिवस के भीतर सड़क कार्य प्रारंभ करें, भले ही साइट पर सुरक्षा बल मौजूद हों या नहीं। साथ ही चेतावनी दी गई थी कि तय समय में कार्य शुरू न करने पर ठेका निरस्त किया जा सकता है।

हकीकत बनाम फाइलों की रिपोर्ट
जमीनी सच्चाई यह है कि बस्तर में अब भी बड़ी संख्या में सशस्त्र नक्सली सक्रिय हैं। कई इलाकों में सुरक्षा बलों की नक्सलियों से मुठभेड़ लगातार जारी है। ऐसे में प्रभावित क्षेत्रों में बिना सुरक्षा व्यवस्था के निर्माण कार्य कराना न सिर्फ लापरवाही है, बल्कि ठेकेदारों और मजदूरों की जान से खिलवाड़ भी है।
स्थानीय जानकारों का कहना है कि नक्सली लंबे समय से सड़क निर्माण और विकास कार्यों को निशाना बनाते रहे हैं। कई बार चेतावनी पोस्टर लगाए गए, लेकिन प्रशासनिक दबाव के चलते काम नहीं रोका गया।
अब सवाल अफसरों की जवाबदेही का
ठेकेदार की हत्या के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सिर्फ नक्सली ही जिम्मेदार हैं या फिर सुरक्षा व्यवस्था को नजरअंदाज कर काम कराने वाले अफसर भी इस त्रासदी के लिए जिम्मेदार हैं? विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में सिर्फ अपराधियों पर नहीं, बल्कि जोखिमपूर्ण परिस्थितियों में ठेकेदारों को काम पर मजबूर करने वाले अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।
फिलहाल पूरे इलाके में दहशत का माहौल है। ठेकेदार और मजदूरों में डर साफ झलक रहा है। यह घटना एक कड़वी याद दिलाती है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जल्दबाजी और फाइलों के भरोसे लिए गए फैसले कितने घातक साबित हो सकते हैं।
