रायपुर, 3 अगस्त 2025: सावन के पवित्र महीने में जहां शिव भक्त देशभर के मंदिरों में उमड़ रहे हैं, वहीं छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आकर्षण का बड़ा केंद्र बना हुआ है। जांजगीर-चांपा जिले के नगर पंचायत खरौद में स्थित यह मंदिर अपनी पौराणिक महत्ता और अद्भुत स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध है।
त्रेतायुग से जुड़ी है मान्यता

लोककथाओं के अनुसार, खर-दूषण के वध के बाद भगवान श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण जी ने इस मंदिर की स्थापना की थी। इसी कारण इसे लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर कहा जाता है। इस मंदिर को त्रेतायुगीन धरोहर माना जाता है।
छत्तीसगढ़ की काशी – खरौद
यह मंदिर धार्मिक नगरी शिवरीनारायण से 3 किमी, रायपुर से 120 किमी और बिलासपुर से 60 किमी की दूरी पर स्थित है। प्राचीन मंदिरों की अधिकता के कारण खरौद को ‘छत्तीसगढ़ की काशी’ भी कहा जाता है।
लक्षलिंग की अद्भुत विशेषता
मंदिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग को ‘लक्षलिंग’ कहा जाता है। जनश्रुति है कि इसमें एक लाख सूक्ष्म छिद्र हैं। इनमें से एक छिद्र पातालगामी माना जाता है, जिसमें डाला गया जल तुरंत अंतर्ध्यान हो जाता है। वहीं एक अन्य अक्षय छिद्र में हमेशा जल भरा रहता है। भक्तों का विश्वास है कि जलाभिषेक का जल मंदिर परिसर के कुण्ड में पहुँचता है, जो कभी सूखता नहीं। शिवलिंग लगभग 30 फीट ऊँचे चबूतरे पर स्थित है और इसे स्वयंभू लिंग माना जाता है।
धार्मिक पर्यटन का केंद्र
सिर्फ सावन ही नहीं, बल्कि पूरे वर्ष लाखों श्रद्धालु इस मंदिर में दर्शन करने आते हैं। अमरनाथ और बारह ज्योतिर्लिंग की तर्ज पर यह मंदिर भी धार्मिक पर्यटन का प्रमुख स्थल बनता जा रहा है।
छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने और प्राचीन धरोहरों के संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों में यह मंदिर राज्य के सांस्कृतिक मानचित्र पर एक खास पहचान बना रहा है।
